दुर्ग। न्यायिक कार्यप्रणाली में डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग और नए आपराधिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के मद्देनजर प्रधान जिला एवं सत्र न्यायालय, दुर्ग में ‘न्यायश्रुति एवं ई-साक्ष्य’ विषय पर विशेष प्रशिक्षण-सह-प्रस्तुतीकरण आयोजित किया गया। कार्यक्रम प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री के. विनोद कुजूर के मार्गदर्शन एवं अध्यक्षता में हुआ, जिसमें न्यायालय के समस्त न्यायाधीशगण ने सहभागिता की।
कार्यक्रम में न्यायश्रुति एप्लिकेशन और ई-साक्ष्य के न्यायालयीन उपयोग के व्यावहारिक पहलुओं पर विशेष जानकारी दी गई। प्रस्तुतीकरण का उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों को डिजिटल तकनीक की जानकारी देने के साथ-साथ यह समझाना रहा कि इन तकनीकों का वास्तविक न्यायालयीन कार्यवाही में प्रभावी ढंग से उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है।
न्यायश्रुति एप्लिकेशन के माध्यम से साक्ष्य दर्ज करने और ऑनलाइन उपस्थिति सुनिश्चित करने की प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से समझाया गया। विभिन्न प्रक्रियाओं को व्यावहारिक उदाहरणों के जरिए प्रस्तुत किया गया, जिससे न्यायिक अधिकारियों को एप्लिकेशन की कार्यप्रणाली और उसके उपयोग को सरलता से समझने में सहायता मिली।
इसी क्रम में ई-साक्ष्य के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने के बाद उसके न्यायिक कार्यवाही में उपयोग से संबंधित प्रक्रिया पर भी विस्तार से जानकारी दी गई। डिजिटल साक्ष्य से जुड़े तकनीकी एवं व्यवहारिक पहलुओं को उदाहरणों के माध्यम से समझाया गया, ताकि न्यायिक अधिकारी इसकी न्यायिक प्रक्रिया को व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझ सकें।

कार्यक्रम में श्री प्रशांत पाराशर, द्वितीय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा श्री दीपक कुमार कोशले, पंचम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के मार्गदर्शन में श्री रवि कुमार महोबिया, व्यवहार न्यायाधीश वरिष्ठ श्रेणी द्वारा प्रस्तुतीकरण किया गया।
प्रशिक्षण को केवल एकतरफा प्रस्तुतीकरण तक सीमित नहीं रखा गया। न्यायिक अधिकारियों ने न्यायश्रुति एवं ई-साक्ष्य से संबंधित विभिन्न तकनीकी और व्यवहारिक प्रश्न पूछे, जिन पर विस्तार से चर्चा की गई। संभावित न्यायालयीन परिस्थितियों और उनसे जुड़े समाधान के पहलुओं को भी स्पष्ट किया गया।
इस प्रशिक्षण का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में आधुनिक तकनीक के प्रभावी समावेश के साथ न्यायालयीन कार्यप्रणाली को अधिक तकनीक-सक्षम, व्यवस्थित और प्रभावी बनाना रहा। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायालय, दुर्ग द्वारा न्यायिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों के निरंतर क्षमता-विकास के लिए आयोजित किए जा रहे ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम बदलती तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप न्यायिक व्यवस्था को सक्षम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माने जा रहे हैं।