बस्तर दशहरा की भीतर रैनी में हादसा, विजय रथ की चपेट में आया ग्रामीण; मौके पर मौत

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व के दौरान बुधवार देर रात भीतर रैनी की पारंपरिक रस्म में दर्दनाक हादसा हो गया। आठ पहियों वाले विशालकाय विजय रथ का संतुलन बिगड़ने से दो ग्रामीण इसकी चपेट में आ गए। हादसे में एक ग्रामीण की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल हो गया। घायल को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया।

घटना जगदलपुर में सिरहासार भवन के पास हुई। हादसे के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। प्रत्यक्षदर्शियों ने रथ परिक्रमा के दौरान पर्याप्त रोशनी और सुरक्षा इंतजाम नहीं होने पर नाराजगी जताई। विरोध बढ़ने के बाद प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस बल मौके पर पहुंचे तथा स्थिति को नियंत्रित किया।

हादसे के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

बस्तर दशहरा की भीतर रैनी रस्म के दौरान विशालकाय विजय रथ को शहर में घुमाकर कुम्हड़ाकोट ले जाने की परंपरा निभाई जाती है। इस आयोजन में बड़ी संख्या में आदिवासी ग्रामीण, श्रद्धालु और दर्शक शामिल होते हैं। ऐसे में रथ की आवाजाही के दौरान भीड़ को नियंत्रित करना और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होता है।

हादसे के बाद लोगों ने रथ के आसपास सुरक्षा व्यवस्था, पर्याप्त रोशनी और सुरक्षित आवाजाही को लेकर सवाल उठाए। घटना ने पारंपरिक आयोजन के दौरान सुरक्षा इंतजामों को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

प्रशासन ने जारी किए नए सुरक्षा निर्देश

हादसे के बाद प्रशासन ने विजय रथ की परिक्रमा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था सख्त करने के निर्देश दिए हैं। नए निर्देशों के अनुसार, विजय रथ के आगे और पीछे 15-15 मीटर का क्षेत्र खाली रखा जाएगा। इस सुरक्षा घेरे में केवल पुलिसकर्मियों और अधिकृत स्वयंसेवकों को रहने की अनुमति होगी।

इस व्यवस्था का उद्देश्य रथ के आसपास भीड़ को नियंत्रित करना और श्रद्धालुओं को संभावित दुर्घटनाओं से बचाना है। प्रशासन के सामने अब सुरक्षा निर्देशों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करने की चुनौती है।

क्या है बस्तर दशहरा की भीतर रैनी परंपरा?

बस्तर दशहरा देश के विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल है। इसकी अनेक रस्में सदियों पुरानी परंपराओं और आदिवासी समाज की आस्थाओं से जुड़ी हैं। भीतर रैनी इसी पर्व की प्रमुख रस्मों में से एक है।

इस परंपरा के तहत आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ की परिक्रमा कराई जाती है। इसके बाद माड़िया समुदाय के ग्रामीण रथ को जगदलपुर से लगभग चार किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट के जंगल की ओर ले जाते हैं। स्थानीय परंपरा में इस रस्म को ‘रथ चोरी’ भी कहा जाता है।

बाहर रैनी में वापस लाया जाता है विजय रथ

भीतर रैनी के बाद बाहर रैनी की परंपरा निभाई जाती है। ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, राजा और आदिवासी समुदाय के बीच संवाद एवं सहमति के बाद विजय रथ को वापस लाया जाता है। इस दौरान नवाखानी की रस्म का भी विशेष महत्व है।

बस्तर दशहरा की ये परंपराएं राजपरिवार और आदिवासी समाज के ऐतिहासिक संबंधों को दर्शाती हैं। हालांकि, इस बार भीतर रैनी के दौरान हुए दर्दनाक हादसे ने आयोजन की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में एक ग्रामीण की मौत और दूसरे के घायल होने की घटना से क्षेत्र में शोक का माहौल है।

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