‘अपहरण के बाद 8-10 लाख में बिक रहा बच्चा’, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र-राज्यों से मांगा जवाब

नई दिल्ली। देश में बच्चों के बढ़ते अपहरण और कथित मानव तस्करी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में बच्चों के अपहरण से जुड़े मामलों में कानून को और सख्त बनाने तथा जांच और सुनवाई की प्रक्रिया तेज करने की मांग की गई है। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह जनहित याचिका वकील अश्विनी उपाध्याय ने दायर की है।

गैर-कानूनी गोद लेने के रैकेट का आरोप

याचिका में आरोप लगाया गया है कि देश में गैर-कानूनी तरीके से बच्चों को गोद देने का संगठित रैकेट चल रहा है। इसके अलावा इंटरस्टेट चाइल्ड ट्रैफिकिंग नेटवर्क के सक्रिय होने का भी दावा किया गया है।

याचिका के मुताबिक, बच्चों का अपहरण कथित तौर पर शोषण, मानव तस्करी और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। इसमें बॉडी पार्ट्स की कथित ट्रेडिंग और मेडिकल ट्रायल जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं।

पुलिस पर भी लगाए गंभीर आरोप

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि लापता या अपहृत बच्चों के मामलों में कई बार पुलिस तत्काल एफआईआर दर्ज नहीं करती और जांच में भी तेजी नहीं दिखाई जाती। याचिका में कहा गया है कि जांच में देरी और लंबे समय तक चलने वाले ट्रायल का फायदा संगठित अपराध से जुड़े गिरोह उठा सकते हैं।

इसी को देखते हुए याचिका में बच्चों के अपहरण के मामलों की जांच एसीपी या एसएचओ स्तर के अधिकारियों से कराने की मांग की गई है।

एक साल में मुकदमे निपटाने के लिए विशेष अदालत की मांग

याचिका में बच्चों के अपहरण से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन की भी मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन मामलों का निपटारा एक साल के भीतर किया जाना चाहिए। इसके लिए एमपी-एमएलए मामलों की तर्ज पर स्पेशल कोर्ट बनाने का सुझाव दिया गया है।

इसके अलावा अपहरण के आरोपियों और उनके परिवार के सदस्यों की संपत्ति जब्त करने जैसे कड़े प्रावधान लागू करने की मांग भी याचिका में की गई है।

बिहार और अन्य राज्यों के आंकड़ों का हवाला

याचिका में बच्चों के लापता होने और मानव तस्करी से जुड़े कई आंकड़ों का हवाला दिया गया है। 1 जून 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, याचिका में दावा किया गया है कि बिहार में वर्ष 2013 से हर साल करीब 15 हजार मिसिंग केस दर्ज होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की होती है। याचिका के मुताबिक, इनमें करीब 50 प्रतिशत बच्चों का ही पता चल पाता है।

एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि मानव तस्करी के मामले ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में दर्ज हुए हैं। नाबालिग लड़कों की तस्करी के मामलों में ओडिशा सबसे आगे और बिहार उसके बाद बताया गया है, जबकि नाबालिग लड़कियों की तस्करी के मामलों में राजस्थान का उल्लेख किया गया है।

याचिका में दावा है कि तस्करी के शिकार बच्चों को भीख मंगवाने, बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति और अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों में धकेला जाता है।

5 जून की दिल्ली पुलिस कार्रवाई का भी जिक्र

याचिका में 5 जून 2026 की दिल्ली पुलिस की एक कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया है। इसके मुताबिक, पुलिस ने कथित बाल तस्करी नेटवर्क से जुड़े 13 लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस के अनुसार, यह नेटवर्क दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात समेत पांच राज्यों में सक्रिय था।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह गिरोह कथित तौर पर ईडब्ल्यूएस और बीपीएल परिवारों से नवजात बच्चों को अगवा कर उन्हें गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए 8 से 10 लाख रुपये तक में बेचता था।

अब सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद केंद्र और राज्य सरकारों के जवाब के आधार पर आगे की सुनवाई में इस मामले में दिशा-निर्देश और कानूनी सुधारों को लेकर तस्वीर स्पष्ट हो सकती है।

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