राजनांदगांव: डोंगरगढ़ की आराध्य मां बम्लेश्वरी के नामकरण और इतिहास को लेकर चल रही बहस ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। पंडित प्रदीप मिश्रा के नाम से सामने आए एक कथित कथा-प्रसंग में देवी के नाम को भगवान शिव के डमरू से निकली ‘बम’ ध्वनि से जोड़ने की बात कही गई है। इस कथन के बाद अखिल भारतीय आदिवासी ध्रुव गोंड समाज महासभा ने आपत्ति जताते हुए इसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के विपरीत बताया है। समाज ने राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर मामले की जांच, कथन के खंडन और स्पष्टीकरण की मांग की है।
गोंड समाज ने बताई ‘दाई बमलाई’ की परंपरा
गोंड समाज का कहना है कि डोंगरगढ़ की देवी को उनकी परंपरा में ‘दाई बमलाई’ के नाम से जाना जाता रहा है। समाज से जुड़े प्रकाशित आख्यानों में बमलाई दाई को गोंड समुदाय की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा से जोड़ा गया है। इसी परंपरा में बाद के समय में ‘बमलाई’ नाम के ‘बम्लेश्वरी’ के रूप में प्रचलित होने की बात कही जाती है।
समाज का दावा है कि यह केवल धार्मिक कहानी नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। हालांकि इस तरह की परंपराओं को प्रमाणित इतिहास मानने के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक दस्तावेजों और अन्य प्रमाणों की जांच जरूरी होगी।
देवी के नाम को लेकर अलग-अलग कथाएं
मां बम्लेश्वरी के नाम और स्वरूप को लेकर डोंगरगढ़ में अलग-अलग धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मंदिर से जुड़े विवरणों में पहाड़ी पर स्थित मंदिर को मां बम्लेश्वरी का प्रमुख धाम और नीचे स्थित मंदिर को छोटी बम्लेश्वरी के नाम से जाना जाता है।
वहीं कुछ धार्मिक एवं स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में देवी को बगलामुखी से जोड़ने वाली परंपरा भी मिलती है। कुछ स्रोतों में 19वीं सदी के संदर्भों में डोंगरगढ़ की देवी के लिए बगलामुखी नाम के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया है। इसके बाद बगलामुखी से बमलाई और फिर बम्लेश्वरी नाम के प्रचलन की मान्यता भी सामने आती है।
‘डमरू के बम नाद’ वाली बात पर उठे सवाल
मौजूदा विवाद का केंद्र पंडित प्रदीप मिश्रा के नाम से सामने आई वह व्याख्या है, जिसमें देवी के नामकरण को भगवान शिव के डमरू की ‘बम’ ध्वनि से जोड़ा गया है।
गोंड समाज का कहना है कि मां के नाम और पूजा परंपरा से जुड़ी उनकी अपनी मान्यता मौजूद है। ऐसे में किसी दूसरे धार्मिक आख्यान के आधार पर नामकरण की व्याख्या किए जाने से उनकी भावनाएं आहत हुई हैं।
डोंगरगढ़ का इतिहास काफी पुराना
डोंगरगढ़ केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। ब्रिटिशकालीन पुरातात्विक दस्तावेजों में डोंगरगढ़ का उल्लेख मिलता है। अलेक्जेंडर कनिंघम की 1881-82 की रिपोर्ट में क्षेत्र की पहाड़ियों, जंगलों, मंदिरों और पुराने अवशेषों का विवरण दर्ज है।
कनिंघम के रिकॉर्ड में 1864 के आसपास डोंगरगढ़ को एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में भी दर्ज किए जाने का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि उस समय डोंगरगढ़ धार्मिक गतिविधियों के साथ व्यापारिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान था।


खैरागढ़ राजपरिवार का भी जुड़ा है इतिहास
डोंगरगढ़ के मंदिर इतिहास से खैरागढ़ रियासत के राजा कमलनारायण सिंह का नाम भी जोड़ा जाता है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उनके शासनकाल में पहाड़ी के नीचे मंदिर और वहां तक पहुंचने वाली सीढ़ियों के निर्माण की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
हालांकि इस संबंध में सामने आने वाले दावों के मूल दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। मंदिर की पूजा परंपरा और प्रबंधन में प्रतिनिधित्व को लेकर गोंड समाज और खैरागढ़ राजपरिवार के बीच पहले भी सवाल उठते रहे हैं।
सिर्फ नामकरण नहीं, परंपरा और इतिहास का भी सवाल
मां बम्लेश्वरी के नाम को लेकर विवाद अब केवल एक कथित बयान तक सीमित नहीं रह गया है। इसके साथ देवी की प्राचीन परंपरा, गोंड समाज की सांस्कृतिक मान्यता, मंदिर की पूजा पद्धति, खैरागढ़ राजपरिवार की भूमिका और उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों से जुड़े सवाल भी सामने आ रहे हैं।
एक तरफ गोंड समाज ‘दाई बमलाई’ की परंपरा को अपनी सांस्कृतिक विरासत बताता है, वहीं अन्य धार्मिक और ऐतिहासिक स्रोत देवी के नाम और स्वरूप को अलग-अलग परंपराओं से जोड़ते हैं।
जांच और स्पष्टीकरण की मांग
गोंड समाज ने राज्यपाल के नाम दिए ज्ञापन में कथित कथन की जांच कराने के साथ उसका खंडन और स्पष्ट स्पष्टीकरण जारी करने की मांग की है। समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
समाज की ओर से कथित बयान के खंडन के साथ माफी की मांग भी उठाई गई है। उनका कहना है कि मांगों पर उचित कार्रवाई नहीं हुई तो लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर आंदोलन को व्यापक रूप दिया जा सकता है।

प्रमाणित तथ्यों से दूर हो सकता है विवाद
डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी के नाम और इतिहास से जुड़े अलग-अलग दावों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन परंपराओं का ऐतिहासिक आधार क्या है। इसके लिए पुराने अभिलेखों, रियासतकालीन दस्तावेजों, मंदिर के रिकॉर्ड, पुरातात्विक प्रमाणों और धार्मिक ग्रंथों की व्यवस्थित जांच जरूरी हो सकती है।
इतिहासकारों, पुरातत्व विशेषज्ञों, मंदिर ट्रस्ट, खैरागढ़ राजपरिवार और गोंड समाज के प्रतिनिधियों को साथ लेकर यदि उपलब्ध सामग्री का अध्ययन किया जाए तो लोकपरंपरा, धार्मिक मान्यता और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
मां बम्लेश्वरी डोंगरगढ़ ही नहीं, बल्कि देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र हैं। ऐसे में विवाद को बढ़ाने के बजाय सभी पक्षों की मान्यताओं का सम्मान करते हुए प्रमाणित तथ्यों को सामने लाना इस पूरे मामले का अधिक स्थायी समाधान साबित हो सकता है।