रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार ने खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 से धान खरीदी व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया है। नई व्यवस्था के तहत अब मठ-मंदिरों, न्यासों और अन्य धार्मिक संस्थाओं की कृषि भूमि का भी एग्रीस्टेक (AgriStack) पोर्टल पर पंजीयन किया जाएगा। इसके बाद इन संस्थाओं को संस्थागत कृषक के रूप में पंजीकृत कर उनकी जमीन पर उत्पादित धान को सहकारी समितियों के माध्यम से बेचने की अनुमति मिलेगी। राज्य सरकार ने इस संबंध में आवश्यक निर्देश जारी कर दिए हैं।
संस्थागत कृषकों को मिलेगा लाभ
नई व्यवस्था के तहत धार्मिक संस्थाओं और न्यासों की कृषि भूमि को भी धान खरीदी की मौजूदा प्रणाली से जोड़ा जाएगा। सरकार का कहना है कि इससे इन संस्थाओं को अपनी उपज बेचने में आने वाली प्रशासनिक दिक्कतें दूर होंगी और वे कृषक उन्नति योजना सहित अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ भी प्राप्त कर सकेंगे।
राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने कहा कि इस फैसले का उद्देश्य मठ-मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं को धान बिक्री की प्रक्रिया में सुविधा उपलब्ध कराना है। वहीं, दक्षिण कौशल पीठाधीश्वर राजीव लोचन महाराज ने भी सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते हुए बताया कि इस विषय पर पहले मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से चर्चा हो चुकी थी।
क्या बदलेगा नई व्यवस्था में?
अब तक धान खरीदी व्यवस्था में मुख्य रूप से व्यक्तिगत किसानों का ही पंजीयन होता था। नई व्यवस्था लागू होने के बाद मठ-मंदिर, न्यास और अन्य पात्र संस्थाओं की कृषि भूमि का भी संस्थागत कृषक के रूप में पंजीयन संभव होगा। इससे इन संस्थाओं की जमीन पर उत्पादित धान को निर्धारित प्रक्रिया के तहत सहकारी समितियों में बेचने का रास्ता खुल जाएगा।
फैसले पर शुरू हुई राजनीतिक बहस
सरकार के इस फैसले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सरकार की नजर अब मठ-मंदिरों की जमीनों पर है। पूर्व मंत्री अमरजीत भगत ने कहा कि पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान ऐसे पंजीयन की आवश्यकता नहीं थी और सरकार की मंशा पर सवाल उठाए।
वहीं, उपमुख्यमंत्री अरुण साव और सांसद एवं पूर्व कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह निर्णय संस्थागत कृषकों को धान खरीदी व्यवस्था से जोड़ने और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के उद्देश्य से लिया गया है। सरकार का दावा है कि इससे धान खरीदी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित होगी।