नई दिल्ली। महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। केंद्र सरकार जहां इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, वहीं विपक्षी दलों ने एकजुट होकर इसकी प्रक्रिया और टाइमिंग पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मुद्दे पर अब संसद के भीतर तीखी बहस के आसार बन गए हैं।
हाल ही में हुई विपक्षी दलों की बैठक के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे ने साफ कहा कि कोई भी दल महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन सरकार जिस तरीके से इसे लागू करना चाहती है, उस पर गंभीर आपत्ति है। उनका कहना है कि सरकार की मंशा और प्रक्रिया दोनों पर स्पष्टता की कमी है, खासकर परिसीमन को लेकर।
“समर्थन है, लेकिन शर्तों के साथ”
खड़गे ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लंबे समय से महिला आरक्षण के पक्षधर रहे हैं। लेकिन उनका आरोप है कि सरकार पुराने प्रावधानों को लागू करने के बजाय नई रणनीति अपना रही है, जिससे संदेह की स्थिति बन रही है।
543 सीटों पर ही लागू करने की मांग
जयराम रमेश ने सुझाव दिया कि मौजूदा लोकसभा की 543 सीटों के आधार पर ही एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि इसे 2029 के चुनाव से प्रभावी किया जा सकता है, जबकि परिसीमन को इससे जोड़ना उचित नहीं है।
परिसीमन पर उठे सवाल
के. सी. वेणुगोपाल ने भी सरकार के रुख पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया संघीय ढांचे को प्रभावित कर सकती है और इस आधार पर बिल का समर्थन करना मुश्किल होगा।
आम आदमी पार्टी का समर्थन
आम आदमी पार्टी ने भी इस मुद्दे पर विपक्ष का साथ दिया है। पार्टी का कहना है कि बिना ताजा जनगणना के परिसीमन करना कई राज्यों के साथ असमानता पैदा कर सकता है।
राजनीतिक हलकों में संकेत मिल रहे हैं कि संसद के विशेष सत्र के दौरान इस मुद्दे पर जोरदार बहस और टकराव देखने को मिल सकता है। महिला आरक्षण का मुद्दा अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है, जिस पर सभी दल अपनी-अपनी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं।