नई दिल्ली : वित्त वर्ष 2025-26 (1 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026) में कई करदाताओं की आय इतनी कम रह सकती है कि वे इनकम टैक्स के दायरे से बाहर आ जाएं। इसका कारण सेक्शन 87ए के तहत मिलने वाली छूट, कम आय, फ्रीलांसिंग, पार्ट-टाइम काम या निवेश से सीमित कमाई हो सकती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब टैक्स देना ही नहीं बनता, तो फिर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करना क्यों जरूरी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही किसी व्यक्ति की टैक्स देनदारी शून्य हो, फिर भी ‘निल रिटर्न’ दाखिल करना कई मायनों में फायदेमंद साबित होता है। यह सिर्फ टैक्स भुगतान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि आपकी सालाना आय और वित्तीय गतिविधियों का आधिकारिक रिकॉर्ड भी होता है, जो आयकर विभाग के सिस्टम में दर्ज रहता है।
आज के समय में आयकर विभाग एडवांस सिस्टम जैसे AIS (Annual Information Statement) और TIS (Taxpayer Information Summary) के जरिए बैंक लेनदेन, निवेश, ब्याज और टीडीएस से जुड़ी जानकारियों पर नजर रखता है। ऐसे में ITR फाइल करने से आपका रिकॉर्ड अधिक पारदर्शी और अपडेटेड रहता है, जिससे भविष्य में किसी तरह की गड़बड़ी या नोटिस की संभावना कम हो जाती है।
कई मामलों में बैंक की ओर से एफडी ब्याज, डिविडेंड, फ्रीलांस आय या अन्य स्रोतों पर टीडीएस काट लिया जाता है। यदि आपकी कुल आय पर टैक्स नहीं बनता, तो ITR दाखिल करके ही आप इस कटे हुए टैक्स का रिफंड प्राप्त कर सकते हैं।
इसके अलावा, बैंक और वित्तीय संस्थान लोन या क्रेडिट कार्ड देते समय आय प्रमाण के तौर पर ITR की मांग करते हैं। नियमित रूप से रिटर्न दाखिल करने से आपकी वित्तीय विश्वसनीयता मजबूत होती है और लोन मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है।
विदेश यात्रा, पढ़ाई या वीजा आवेदन के दौरान भी पिछले कुछ वर्षों के ITR रिकॉर्ड को जरूरी दस्तावेज माना जाता है। इससे आपकी आर्थिक स्थिति का आकलन किया जाता है, इसलिए निल रिटर्न भी भविष्य की जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि यदि किसी साल शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड या बिजनेस में नुकसान हुआ हो, तो ITR फाइल करके उसे आगे के वर्षों में एडजस्ट किया जा सकता है, जिससे टैक्स बचत का लाभ मिलता है।
नियमित रूप से ITR दाखिल करने से करदाता का रिकॉर्ड मजबूत और साफ बना रहता है, जिससे भविष्य में जांच, नोटिस या किसी वित्तीय दिक्कत की संभावना काफी हद तक कम हो जाती है।