नई दिल्ली। भारत और ओमान के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) सोमवार, 1 जून 2026 से आधिकारिक रूप से लागू हो गया। इस समझौते के प्रभावी होने के साथ ही दोनों देशों के व्यापारिक और आर्थिक संबंधों को नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसे भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि CEPA के लागू होने से भारतीय निर्यातकों को ओमान के बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी। इससे विशेष रूप से टेक्सटाइल, कृषि, समुद्री उत्पाद, ऑटोमोबाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी, इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों को बड़ा लाभ मिलने की संभावना है।
11 अरब डॉलर के पार पहुंचा व्यापार
भारत और ओमान के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़कर 11.18 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष में 10.61 अरब डॉलर था। ओमान वर्तमान में खाड़ी क्षेत्र में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार माना जाता है।
यह समझौता 18 दिसंबर 2025 को ओमान की राजधानी मस्कट में हस्ताक्षरित किया गया था। दोनों देशों की आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद इसे 1 जून 2026 से लागू कर दिया गया।
28 अरब डॉलर के आयात बाजार तक आसान पहुंच
ओमान का वार्षिक आयात बाजार 28 अरब डॉलर से अधिक का है। CEPA लागू होने के बाद भारतीय कंपनियों को कई उत्पादों पर रियायती शुल्क दरों का लाभ मिलेगा। इससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और निर्यातकों की लागत में कमी आएगी।
समझौते के लागू होने के पहले ही दिन मुंबई, चेन्नई और कोलकाता बंदरगाहों से कृषि उत्पादों तथा रत्न एवं आभूषणों की कई खेपें विशेष रियायती शुल्क व्यवस्था के तहत ओमान भेजी गईं।
FTA से अधिक व्यापक है CEPA
विशेषज्ञों के अनुसार, CEPA सामान्य मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की तुलना में अधिक व्यापक और प्रभावी व्यवस्था है। जहां FTA मुख्य रूप से वस्तुओं पर लगने वाले आयात-निर्यात शुल्क को कम करने तक सीमित रहता है, वहीं CEPA में वस्तुओं के व्यापार के साथ सेवा क्षेत्र, निवेश, पेशेवरों की आवाजाही, नियामकीय सहयोग और विवाद समाधान तंत्र भी शामिल होते हैं।
इस समझौते से भारत और ओमान के बीच व्यापारिक बाधाएं कम होंगी, निवेश को बढ़ावा मिलेगा और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग और गहरा होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह समझौता भारत के निर्यात और निवेश वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।