नई दिल्ली: बचपन में तीसरी बेटी होने पर समाज की सोच और तानों का सामना करने वाली शर्मिला मोना सिन्हा ने आज अमेरिका में बड़ी पहचान बनाई है। न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित National Women’s Hall of Fame में शामिल होकर उन्होंने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वह इस सम्मान को पाने वाली भारतीय मूल की दूसरी महिला हैं। उनसे पहले पेप्सिको की पूर्व CEO इंदिरा नूयी को यह सम्मान मिला था।
लेकिन शर्मिला की पहचान सिर्फ इस सम्मान तक सीमित नहीं है। उनके जीवन की शुरुआत ऐसे माहौल में हुई, जहां बेटियों को लेकर भेदभाव आम बात थी। बचपन में मिले इन्हीं अनुभवों ने आगे चलकर उन्हें महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने की प्रेरणा दी।
तीसरी बेटी होने पर सुनने पड़े ताने
कोलकाता में पली-बढ़ीं शर्मिला ने अपने बचपन के अनुभवों को याद करते हुए बताया कि उनके आसपास ऐसी सोच थी, जिसमें बेटे को परिवार के लिए फायदेमंद और बेटी को बोझ माना जाता था। तीसरी बेटी होने के कारण उन्हें भी इस सोच का सामना करना पड़ा।
इन अनुभवों ने शर्मिला के मन में यह सवाल खड़ा किया कि लड़कियों के लिए समाज अलग नियम क्यों तय करता है। आगे चलकर उन्होंने इन्हीं सोच और बंदिशों को चुनौती देने का फैसला किया।
मदर टेरेसा के अनाथालय से मिली नई सोच
किशोरावस्था से पहले शर्मिला ने कोलकाता में मदर टेरेसा के अनाथालय में वॉलंटियर के तौर पर काम किया। वहां उन्होंने जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी को करीब से देखा।
इस दौरान उन्हें पता चला कि अनाथालय में छोड़े गए लड़कों को लड़कियों की तुलना में आसानी से गोद लिया जाता था। यह बात शर्मिला को काफी परेशान करती थी। उनके मन में सवाल उठा कि बच्चों के भविष्य का फैसला उनके जेंडर के आधार पर क्यों होना चाहिए।
दादी की कहानी से मिली प्रेरणा
किशोरावस्था में शर्मिला को अपनी दादी के बारे में पता चला। उनकी दादी ने आजादी के आंदोलन के दौरान महिलाओं को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी। दादी की कहानी ने शर्मिला को पुरानी सोच को चुनौती देने और महिलाओं के लिए काम करने की प्रेरणा दी।
18 साल की उम्र में चली गईं अमेरिका
शर्मिला ने 18 साल की उम्र में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका का रुख किया। उन्होंने मैसाचुसेट्स के स्मिथ कॉलेज से इकोनॉमिक्स और आर्ट हिस्ट्री में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद उन्होंने कोलंबिया बिजनेस स्कूल से MBA किया।
उनके करियर की शुरुआत मॉर्गन स्टेनली में इन्वेस्टमेंट बैंकर के तौर पर हुई। इसके बाद उन्होंने प्रॉक्टर एंड गैंबल, यूनिलीवर और एलिजाबेथ आर्डेन जैसी बड़ी कंपनियों में भी काम किया।
कॉर्पोरेट नौकरी से सामाजिक काम तक पहुंचीं
शर्मिला ने कॉर्पोरेट क्षेत्र में हासिल अनुभव को सामाजिक काम में लगाया। उन्होंने Women Moving Millions नेटवर्क का नेतृत्व किया। इस नेटवर्क से जुड़े लोगों ने महिलाओं के कल्याण के लिए करीब 1 अरब डॉलर की फंडिंग देने की प्रतिबद्धता जताई।
वह ऑस्कर के लिए नामांकित डॉक्यूमेंट्री To Kill a Tiger की एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर भी रही हैं। साल 2022 से वह अंतरराष्ट्रीय संगठन Equality Now की CEO हैं। यह संगठन बाल विवाह, यौन हिंसा और महिलाओं के कानूनी अधिकारों जैसे मुद्दों पर काम करता है।
मां की ‘मुट्ठी भर चावल’ वाली सीख नहीं भूलीं
National Women’s Hall of Fame में शामिल किए जाने के समारोह में शर्मिला ने अपनी मां को याद किया। उन्होंने बताया कि उनकी मां हर सुबह किसी जरूरतमंद के लिए मुट्ठी भर चावल अलग निकालकर रखती थीं।
शर्मिला ने कहा कि मां की यही छोटी-सी सीख उनके लिए बड़ी प्रेरणा बनी। वह इस सम्मान को सिर्फ अपनी उपलब्धि नहीं मानतीं, बल्कि इसे आगे भी लोगों के लिए काम करने की जिम्मेदारी के तौर पर देखती हैं।
तीसरी बेटी होने पर मिले तानों से लेकर अमेरिका के प्रतिष्ठित National Women’s Hall of Fame तक का शर्मिला मोना सिन्हा का सफर संघर्ष, मेहनत और सामाजिक बदलाव की सोच की कहानी है।