Thyroid Problem: आज की व्यस्त जीवनशैली में थायरॉइड की समस्या तेजी से बढ़ रही है। आधुनिक चिकित्सा इसे हार्मोनल असंतुलन के रूप में पहचानती है, जबकि आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर में गहरे स्तर पर हुए असंतुलन का संकेत है — यानी केवल ग्रंथि नहीं, बल्कि संपूर्ण शरीर के चयापचय और ऊर्जा संतुलन से जुड़ा विषय।
आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से थायरॉइड
आयुर्वेद में थायरॉइड को ‘अग्नि दोष’, ‘धातु विकृति’ और ‘त्रिदोष असंतुलन’ का परिणाम माना गया है। इसमें वात, पित्त और कफ — तीनों दोषों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। थायरॉइड ग्रंथि का सीधा संबंध विशुद्ध चक्र (गले के ऊर्जा केंद्र) से बताया गया है, जो शरीर की पाचन शक्ति (जठराग्नि) और ऊतकों की अग्नि (धात्वग्नि) को नियंत्रित करता है।
- हाइपोथायरायडिज्म (थायरॉइड की कमी) में वात और कफ की वृद्धि होती है, जिससे शरीर में सुस्ती, वजन बढ़ना, ठंड लगना और थकान जैसे लक्षण दिखते हैं।
- हाइपरथायरायडिज्म (थायरॉइड की अधिकता) में पित्त की वृद्धि से चिड़चिड़ापन, वजन कम होना, हृदयगति तेज होना और बेचैनी जैसी समस्याएं देखी जाती हैं।
आयुर्वेदिक उपचार और जीवनशैली
आयुर्वेद के अनुसार, थायरॉइड को संतुलित करने के लिए जीवनशैली और आहार में परिवर्तन अत्यंत आवश्यक है।
मुख्य उपाय:
- पर्याप्त नींद और तनाव-मुक्त जीवन अपनाएं।
- हल्का व्यायाम करें जैसे सूर्य नमस्कार, मत्स्यासन, सर्वांगासन और नौकासन।
- अनुलोम-विलोम और उज्जायी प्राणायाम रोजाना करें, ये गले के क्षेत्र को सक्रिय करते हैं।
- रोज सुबह 10-15 मिनट सूर्य की गुनगुनी धूप जरूर लें।
आहार और जड़ी-बूटियां
- आयुर्वेद में कुछ औषधीय पौधों को थायरॉइड संतुलन के लिए बेहद प्रभावी माना गया है —
अश्वगंधा, गुग्गुलु, त्रिफला, और शिलाजीत प्रमुख हैं। - आहार में आयोडीन, जिंक और सेलेनियम से भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे मूंग, तिल, दही और ताजे फल शामिल करें।
पंचकर्म और मानसिक शुद्धि
पंचकर्म थेरेपी शरीर से विषाक्त पदार्थ (टॉक्सिन्स) निकालकर दोषों को संतुलित करती है। साथ ही ध्यान और प्राणायाम मानसिक शांति देकर हार्मोनल स्थिरता बनाए रखते हैं।