प्रयागराज। Allahabad High Court ने सार्वजनिक स्थलों पर धार्मिक गतिविधियों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसी जगहों का उपयोग किसी एक वर्ग के अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक भूमि सभी नागरिकों के लिए समान रूप से उपलब्ध होती है और उसका इस्तेमाल नियमों और कानून के दायरे में ही होना चाहिए।
कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी रेखांकित किया कि संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता जरूर देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण रूप से निरंकुश नहीं है। इसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी, अन्य लोगों के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की बाध्यता भी जुड़ी होती है।
यह मामला संभल जिले की गुन्नौर तहसील के एक गांव से जुड़ा था, जहां एक व्यक्ति ने जमीन को अपनी निजी संपत्ति बताते हुए वहां नमाज़ पढ़ने की अनुमति और सुरक्षा की मांग की थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि संबंधित भूमि सरकारी रिकॉर्ड में सार्वजनिक उपयोग की श्रेणी में दर्ज है और याचिकाकर्ता अपने स्वामित्व का ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका।
अदालत ने राज्य की भूमिका पर भी जोर देते हुए कहा कि प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह सार्वजनिक स्थलों पर सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित करे और किसी भी ऐसी गतिविधि को नियंत्रित करे, जिससे यातायात, सुरक्षा या सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
साथ ही, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निजी संपत्ति पर सीमित स्तर पर धार्मिक गतिविधियां संभव हैं, लेकिन उसे बड़े पैमाने पर नियमित आयोजन का केंद्र नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब इससे कानून-व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका हो।
राज्य सरकार की ओर से यह तर्क रखा गया कि संबंधित स्थल पर पहले केवल विशेष अवसरों पर ही धार्मिक आयोजन होते थे, लेकिन हाल में नियमित गतिविधियां शुरू करने की कोशिश की जा रही थी। अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि प्रशासन को ऐसी नई व्यवस्थाओं पर नियंत्रण रखने का अधिकार है।
अपने फैसले में अदालत ने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसे तत्वों के अधीन है। किसी भी नागरिक या समूह का अधिकार दूसरों के अधिकारों में बाधा नहीं बन सकता।
अंततः अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि इस मामले में राहत देने का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं बनता।