नई दिल्ली: इंडिगो की बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द होने पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से कड़े शब्दों में सवाल पूछे हैं। अदालत ने कहा कि यह “गंभीर संकट” है और सरकार स्पष्ट करे कि हालात अचानक बिगड़ने की वजह क्या थी और इसके लिए आखिर जिम्मेदार कौन है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह केवल यात्रियों की परेशानी का मुद्दा नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा मामला है।
हाईकोर्ट ने बढ़े हुए हवाई किराए पर भी सख्त रुख अपनाया। अदालत ने पूछा कि जो टिकट पहले 5,000 रुपये में मिलते थे, वे अचानक 30,000-35,000 रुपये तक कैसे पहुंच गए? कोर्ट ने कहा, “अगर वाकई संकट था, तो अन्य एयरलाइनों को इसका अनुचित लाभ उठाने कैसे दिया गया? टिकट के दाम 35,000-39,000 तक कैसे पहुंच सकते हैं?”
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कुछ दस्तावेज प्रस्तुत कर सरकार की ओर से लागू व्यवस्था का उल्लेख किया, लेकिन कोर्ट ने असंतोष जताते हुए कहा कि यात्रियों को मुआवजा देने या उनका पैसा लौटाने के लिए ठोस कार्रवाई दिखनी चाहिए। इसी क्रम में अदालत ने DGCA और केंद्र को निर्देश दिया कि प्रभावित यात्रियों की टिकट राशि वापस की जाए।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अप्रैल 2025 में जारी आदेश के तहत एफडीटीएल (Flight Duty Time Limit) प्रणाली को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाना था, और एक नवंबर से रात में लैंडिंग संबंधी नियम प्रभावी होने थे। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इंडिगो इन नियमों के पालन के लिए पर्याप्त पायलटों की भर्ती नहीं कर पाया। साथ ही, सॉफ्टवेयर सपोर्ट में भी गंभीर कमी रही, जिससे परिचालन में बड़े पैमाने पर बाधाएं उत्पन्न हुईं।
अदालत ने टिप्पणी की कि एयरलाइन का स्टाफ यात्रियों की चिंताओं को जिस गंभीरता से संबोधित करना चाहिए था, वह नहीं किया गया—जो न केवल कानूनी अपेक्षा है बल्कि किसी सभ्य समाज में न्यूनतम जिम्मेदारी भी है।
कोर्ट ने केंद्र से यह भी पूछा कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई और इसे रोकने के लिए पहले क्या उपाय किए गए थे।