रोज़मर्रा की तरह मैं काम में मशगूल था,लोगों की दुनियादारी से कोसों मैं दूर था : डॉ. अरुण मिश्रा

डॉ. अरुण मिश्रा लोकतन्त्र प्रहरी के दैनिक पाठक द्वारा भेजे गए पत्र से..

चाटुकार

रोज़मर्रा की तरह मैं काम में मशगूल था,

लोगों की दुनियादारी से कोसों मैं दूर था।

साक्षात् दण्डवत चरणों में गिर पड़े,

कहा— “एक बार माफ़ कर दो, मेरा बड़ा कसूर था।”

ना मैंने सवाल पूछा, क्या गलती थी तुम्हारी,

जो माफ़ी माँगने आना पड़ा शरण में हमारी।

ज़हरीली मुस्कान लेकर, नज़रें झुकाकर बोले,

“दगा कर रहा हूँ आपसे, आप इंसान हो बड़े भोले।”

ना चरण छोड़ रहा था, दे रहा था रिश्तों का हवाला,

वाकिफ़ था उसकी रग से, फिर भी माफ़ी दे डाला।

अब हमसे नज़र मिलाने में आँखें चुरा रहे हैं,

गिरगिट जी अपना रंग आज भी दिखा रहे हैं।

ये आदत है उनकी, बातों से मुकर जाते हैं,

ज़रूरत पड़ने पर चाटुकार बन जाते हैं।

— डॉ. अरुण मिश्रा “अकेला”

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