- राजकीय सम्मान के साथ हुआ अंतिम संस्कार, पुलिस जवानों ने दिया गार्ड ऑफ ऑनर
दुर्ग, 05 जुलाई 2026/ छत्तीसगढ़ की लोक कला को विश्व पटल पर प्रतिष्ठा दिलाने वाली महान पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का पार्थिव देह आज उनके निवास ग्राम गनियारी के मुक्तिधाम में पंचतत्व में विलीन हो गया। उनके पुत्र दिलहरण पारधी ने मुखाग्नि दी। अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुई, इस दौरान पुलिस जवानों ने दिवंगत कलाकार को गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया।
अंत्येष्टि कार्यक्रम में स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, सांसद विजय बघेल, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, विधायक डोमन लाल कोर्सेवाड़ा, ललित चंद्राकर, रिकेश सेन, अनूप शर्मा सहित संभाग आयुक्त एस.एन. राठौर, आईजी अभिषेक शांडिल्य, कलेक्टर अभिजीत सिंह एवं एसएसपी विजय अग्रवाल ने पार्थिव देह पर पुष्पचक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, लोक कलाकार एवं आमजन उपस्थित रहे।



उल्लेखनीय है कि पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का आज रविवार तड़के निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और राजधानी रायपुर स्थित एम्स में उनका उपचार चल रहा था। उन्होंने आज सुबह लगभग 3:15 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन से कला जगत सहित पूरे प्रदेश में शोक की लहर व्याप्त है।
लोक कला को वैश्विक पहचान दिलाने वाली विभूति
जब भी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की बात होती है, तो पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का नाम श्रद्धा के साथ लिया जाता है। अपनी ओजस्वी आवाज, सशक्त अभिनय और रंग-बिरंगे तानपुरे के साथ उन्होंने महाभारत की कथाओं को जीवंत कर पंडवानी जैसी लोककला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
डॉ. तीजन बाई का जन्म वर्ष 1956 में दुर्ग जिले (वर्तमान छत्तीसगढ़) के गनियारी गांव में पारधी समुदाय के एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता चुनुकलाल (हुनुकलाल) पारधी एवं माता सुखवती देवी थीं। बचपन में नाना ब्रजलाल से महाभारत की कथाएं सुनकर उनका रुझान पंडवानी की ओर बढ़ा।

परंपरा को तोड़कर रचा इतिहास
उस समय महिलाओं द्वारा पंडवानी की कापालिक शैली में मंच पर अभिनय के साथ प्रस्तुति देना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं था। डॉ. तीजन बाई ने तमाम विरोधों और सामाजिक बहिष्कार के बावजूद इस परंपरा को तोड़ा और कापालिक शैली में मंच पर खड़े होकर अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं के साथ पंडवानी प्रस्तुत कर नई पहचान दिलाई। उनका तानपुरा कभी भीम की गदा, कभी अर्जुन का धनुष तो कभी दुर्योधन की तलवार का रूप ले लेता था, जिससे दर्शक महाभारत के दृश्य में पूरी तरह डूब जाते थे।
देश-विदेश में छत्तीसगढ़ की संस्कृति का परचम
डॉ. तीजन बाई ने भारत के साथ-साथ ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, तुर्की सहित अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति दी और भारतीय लोककला को वैश्विक पहचान दिलाई। उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोककला भाषा और सीमाओं की मोहताज नहीं होती।
सम्मान और उपलब्धियाँ
लोककला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया, जिनमें—
- पद्म (1988)
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
- पद्म भूषण (2003)
- पद्म विभूषण (2019)
प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त देश-विदेश की अनेक संस्थाओं द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया तथा कई विश्वविद्यालयों ने मानद उपाधियाँ प्रदान कीं।
अमिट विरासत
डॉ. तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक विरासत की सशक्त प्रतीक थीं। उन्होंने आजीवन पंडवानी की शिक्षा देकर इस लोककला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य किया। उनकी जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि दृढ़ संकल्प और मेहनत से एक छोटे से गांव की बेटी भी विश्व पटल पर अपनी संस्कृति का गौरव बढ़ा सकती है।
पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि भारतीय लोककला की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं, जिनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।