नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पुरुष और महिला बिना शादी किए पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और उनका संबंध “शादी जैसे रिश्ते” (In the Nature of Marriage) की श्रेणी में आता है, तो ऐसी महिलाओं को भी क्रूरता और घरेलू हिंसा से जुड़े कानूनी संरक्षण का अधिकार मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में पुरुष पार्टनर और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता में समकक्ष प्रावधान) के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
किन मामलों में मिलेगा संरक्षण?
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था हर लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं होगी। केवल वही संबंध इस दायरे में आएंगे जो वास्तविक रूप से “शादी जैसे रिश्ते” की प्रकृति रखते हों। इसके लिए दोनों पक्षों का बालिग होना, आपसी सहमति से साथ रहना और भविष्य में विवाह करने का इरादा जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण माना जाएगा।
गिरफ्तारी से पहले होगी प्रारंभिक जांच
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पुलिस सीधे आरोपी को गिरफ्तार नहीं करेगी। किसी भी गिरफ्तारी से पहले पुलिस को प्रारंभिक जांच करनी होगी और कानून में निर्धारित सभी प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य होगा। अदालत ने कहा कि इस फैसले का उद्देश्य महिलाओं को कानूनी सुरक्षा देना है, न कि कानून के दुरुपयोग को बढ़ावा देना।
महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं हो सकता
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लेख करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा या क्रूरता के मामलों में विवाहित महिला और शादी जैसे लिव-इन संबंध में रहने वाली महिला के बीच भेदभाव करना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि किसी भी महिला को केवल इसलिए कानूनी संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका संबंध औपचारिक विवाह में नहीं है।
फैसले का महत्व
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करेगा। साथ ही अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया है कि कानून का संतुलित उपयोग हो और किसी भी आरोपी के खिलाफ कार्रवाई से पहले विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किया जाए।