नई दिल्ली। भारत में पेट और आंतों से जुड़ी बीमारियों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, देश में एक ओर हेलिकोबैक्टर पाइलोरी और आंतों के कीड़ों जैसे संक्रमण अब भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं, वहीं दूसरी ओर फैटी लिवर और कोलोरेक्टल कैंसर जैसी चयापचयी एवं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के मामले भी बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों ने पेट और आंत संबंधी बीमारियों की समय रहते पहचान और रोकथाम पर अधिक ध्यान देने की जरूरत बताई है।
ये चिंताएं वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी (डब्ल्यूसीओजी) 2026 से पहले सामने आई हैं। यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन पहली बार भारत में आयोजित होने जा रहा है। 30 सितंबर से 3 अक्टूबर तक दिल्ली के द्वारका स्थित यशोभूमि में होने वाले इस कार्यक्रम में दुनियाभर के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विशेषज्ञ पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के बदलते स्वरूप और उनके बढ़ते स्वास्थ्य प्रभाव पर चर्चा करेंगे।
फैटी लिवर बना बड़ी चिंता
एम्स के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. शालीमार के अनुसार, फैटी लिवर की बीमारी भारत में तेजी से बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन रही है। एम्स के नेतृत्व में की गई एक व्यवस्थित समीक्षा और विश्लेषण के मुताबिक, भारत में करीब 38.6 प्रतिशत वयस्कों और 35.4 प्रतिशत बच्चों में फैटी लिवर की समस्या पाई गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक फैटी लिवर का संबंध मधुमेह, मोटापे और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं से गहराई से जुड़ा है। चिंता की बात यह है कि कई मरीजों में शुरुआत में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। ऐसे में बीमारी का पता देर से चलता है और तब तक लिवर को काफी नुकसान पहुंच सकता है।
एक हालिया अध्ययन में यह भी सामने आया है कि टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित करीब हर चार मरीजों में से एक में लिवर फाइब्रोसिस की गंभीर समस्या देखी गई।
कम उम्र में बढ़ रहा कोलोरेक्टल कैंसर
कोलोरेक्टल कैंसर भी विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। डॉक्टरों के अनुसार, कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2022 में भारत में पुरुषों में 40,430 और महिलाओं में 24,433 नए कोलोरेक्टल कैंसर के मामले दर्ज किए गए।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मल में खून आना, मल त्यागने की आदत में लगातार बदलाव और बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इन्हें सामान्य पेट की समस्या मानकर लंबे समय तक टालना गंभीर हो सकता है।
एम्स के प्रोफेसर और डब्ल्यूसीओजी 2026 की स्थानीय आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. गोविंद मखारिया ने कहा कि भारत में गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और आधुनिक तकनीक की कमी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि लोग शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से लें। उन्होंने कहा कि यदि कोई लक्षण दो से तीन सप्ताह से अधिक समय तक बना रहता है तो उसकी जांच जरूर करवानी चाहिए।
संक्रमण भी बना हुआ है चुनौती
भारत में पेट और आंतों से जुड़े संक्रमण भी स्वास्थ्य समस्या का अहम हिस्सा हैं। हेलिकोबैक्टर पाइलोरी संक्रमण पेप्टिक अल्सर और पेट के कैंसर से जुड़ा हुआ है और यह अब भी बड़े पैमाने पर पाया जाता है।
वहीं, बच्चों में आंतों के कीड़ों का संक्रमण भी चिंता का विषय है। इससे रक्ताल्पता और कुपोषण जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा सीलिएक रोग और इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज जैसी बीमारियां, जिन्हें पहले भारत में अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता था, अब अधिक संख्या में सामने आ रही हैं।
डब्ल्यूसीओजी 2026 में नई तकनीकों पर भी चर्चा
डब्ल्यूसीओजी 2026 में दुनियाभर में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारियों के बदलते बोझ की समीक्षा की जाएगी। सम्मेलन में डायग्नोस्टिक्स, एंडोस्कोपी, आधुनिक उपचार पद्धतियों, गट माइक्रोबायोम रिसर्च और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित स्वास्थ्य सेवाओं में हुई प्रगति पर भी चर्चा होगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों से निपटने के लिए जल्दी जांच, जागरूकता, बेहतर जीवनशैली और रोकथाम पर विशेष जोर देने की जरूरत है।