नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा मामलों को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल दावों या सामान्य आरोपों के आधार पर पति के रिश्तेदारों को आपराधिक मामले में घसीटा नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में ससुराल पक्ष को आरोपी बनाने के लिए ठोस और विश्वसनीय सबूत होना अनिवार्य है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने एक मामले की सुनवाई करते हुए ससुराल पक्ष के खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न और आईपीसी की धारा 498ए के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया।
यह मामला मध्य प्रदेश के गुना जिले का है, जहां एक महिला ने अपने पति और ससुराल वालों पर वर्ष 2019 में शादी के बाद दहेज उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और घरेलू हिंसा के गंभीर आरोप लगाए थे। महिला ने शिकायत में कहा था कि शादी के समय भारी नकद, गहने और घरेलू सामान दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद अतिरिक्त दहेज की मांग की गई और उसे प्रताड़ित किया गया।
मामले में यह भी आरोप लगाए गए थे कि महिला पर निगरानी रखी जाती थी, उसके आने-जाने पर रोक थी और उसे धमकियां भी दी गईं। इसी आधार पर उसने पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई थी।
हाईकोर्ट ने इस मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया था और ससुराल पक्ष के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी थी। इसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि कई बार वैवाहिक विवादों में गुस्से और तनाव के चलते पूरे परिवार को गलत तरीके से फंसा दिया जाता है। अदालत ने साफ किया कि केवल सामान्य या अस्पष्ट आरोपों के आधार पर रिश्तेदारों को आरोपी बनाना कानून का दुरुपयोग है।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि दहेज कानून का उद्देश्य पीड़ितों की सुरक्षा है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी भी निर्दोष व्यक्ति को फंसाने के लिए “हथियार” की तरह नहीं किया जा सकता।
इस फैसले के बाद निचली अदालतों के लिए भी दिशा-निर्देश माने जा रहे हैं कि वे ऐसे मामलों में सावधानी बरतें और केवल मजबूत सबूतों के आधार पर ही आगे की कार्रवाई करें।