नई दिल्ली : नई दिल्ली से दूर ओडिशा के गंजम जिले में स्थित मां कुरैसुनी मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं और रहस्यमयी आस्था के लिए जाना जाता है। यह मंदिर अन्य शक्तिपीठों से अलग है, क्योंकि यहां सालभर देवी के मुख नहीं बल्कि उनकी पीठ की पूजा की जाती है।
पात्रपुर ब्लॉक के नुवागाड़ा गांव में प्राकृतिक हरियाली और पहाड़ियों के बीच बसे इस मंदिर में भक्तों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से ही कष्ट दूर होते हैं और विशेष अवसर पर मां के मुख के दर्शन करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
मंदिर की सबसे खास परंपरा यह है कि पूरे वर्ष देवी की पीठ की पूजा होती है, जबकि आश्विन माह की दुर्गाष्टमी के दिन ही मां के मुख के दर्शन संभव होते हैं। इस दिन दूर-दूर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं, जिससे यहां उत्सव जैसा माहौल बन जाता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 20वीं सदी की शुरुआत में सुरंगी के एक राजा द्वारा कराया गया था। मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली से प्रभावित दिखाई देती है, जिसमें रंग-बिरंगे गोपुरम और देवी-देवताओं की आकर्षक प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं।
मंदिर परिसर में मां काली की विभिन्न प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, जिनमें उनका उग्र रूप दर्शाया गया है। इसके अलावा, यहां एक विशेष पेड़ भी है जिसे ‘मनोकामना वृक्ष’ कहा जाता है। श्रद्धालु अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इस पेड़ पर लाल चुनरी बांधते हैं।
चारों ओर हरियाली और शांत वातावरण से घिरा यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक बल्कि मानसिक शांति की तलाश करने वालों के लिए भी एक खास स्थान बन चुका है। त्योहारों और खास अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जो इस स्थल की लोकप्रियता और आस्था का प्रतीक है।