धर्म डेस्क। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी (हरिशयनी) एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत हो जाती है। सनातन परंपरा में इस दिन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इसी तिथि से भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ ही विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, भूमि पूजन और अन्य मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार एक संवत्सर में कुल 24 एकादशियां आती हैं, जिनमें आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का विशेष स्थान है। इसी दिन से शुरू होने वाला चातुर्मास आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन मास तक चलता है। मांगलिक कार्यों की दोबारा शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी (हरि प्रबोधिनी) एकादशी से होती है।
हरिद्वार के विद्वान पंडित श्रीधर शास्त्री के अनुसार, चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु विश्राम करते हैं और इस अवधि में संपूर्ण सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं। इसलिए इस समय विवाह सहित सभी शुभ और मांगलिक कार्यों के लिए पंचांग में शुभ मुहूर्त नहीं माना जाता।
धार्मिक मान्यता है कि देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक विवाह संस्कार, गृह प्रवेश, मुंडन, नींव पूजन, नए वाहन की खरीद और बड़े धार्मिक अनुष्ठानों जैसे कार्यों से बचना चाहिए। मान्यता के अनुसार इस अवधि में ऐसे कार्य करने से दोष लगता है, जिसका निवारण भी कठिन माना गया है।
देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा, सहस्रनाम का पाठ, व्रत और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की आराधना कर सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना करते हैं।