काठमांडू। नेपाल के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने के बाद आई भीषण प्राकृतिक आपदा ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी है। करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा ढहने से बर्फ, पानी, चट्टानों और मलबे का तेज बहाव निचले इलाकों की ओर पहुंचा। इसकी चपेट में कई बस्तियां, सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं।
रिपोर्टों में अब तक 1,050 से अधिक लोगों की मौत और करीब 3,900 लोगों के लापता होने का दावा किया गया है। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी 16 लोगों की मौत और 546 लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है।
133 भारतीयों के लापता होने की सूचना
आपदा से नेपाल पहुंचे विदेशी नागरिक और पर्यटक भी प्रभावित हुए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, करीब 133 भारतीय नागरिकों के लापता होने की सूचना है। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग पर मौजूद कई लोगों के शामिल होने की बात कही जा रही है। सीमा जांच चौकी के पास खड़े 300 से अधिक वाहन और ट्रक भी तेज बहाव में बह गए।
खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं
आपदा के बाद कई इलाकों में पानी का प्रवाह कम हुआ है और नदियां सामान्य स्थिति की ओर लौट रही हैं। इसके बावजूद हिमालयी क्षेत्र में खतरा बरकरार है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों और ग्लेशियरों की अस्थिर स्थिति को लेकर नए भूस्खलन की आशंका जताते हुए सतर्क रहने की चेतावनी दी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने और भारी भूस्खलन के बाद नदियों में मलबे के अस्थायी बांध बन सकते हैं। इनके अचानक टूटने पर निचले इलाकों में फ्लैश फ्लड यानी अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।
50 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से बढ़ा मलबे का सैलाब
बताया जा रहा है कि 26 अगस्त को नेपाल के लांगटांग लिरुंग क्षेत्र में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। इसके बाद बर्फ, पानी, चट्टानों और मलबे का सैलाब करीब 50 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नीचे की ओर बढ़ा और 20 किलोमीटर से अधिक दूरी तक फैल गया।
संकरी हिमालयी घाटियों से गुजरते हुए इस मलबे ने रास्ते में मिट्टी, पानी और बड़ी चट्टानों को अपने साथ मिला लिया, जिससे इसकी विनाशकारी क्षमता और बढ़ गई।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा जोखिम
वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ और चट्टानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है। ग्लेशियर झीलों के फटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा भी बढ़ रहा है।
नेपाल में बड़ी संख्या में बस्तियां, सड़कें और पनबिजली परियोजनाएं संकरी नदी घाटियों के आसपास स्थित हैं। ऐसे में ग्लेशियर टूटने या भूस्खलन की घटनाएं बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा सकती हैं।
फिलहाल राहत और बचाव दल प्रभावित क्षेत्रों में मलबे में दबे लोगों की तलाश में जुटे हैं। हालांकि, ऊंचाई वाले इलाकों में अस्थिर परिस्थितियों के कारण बचाव अभियान में भी खतरा बना हुआ है।