नई दिल्ली। छात्र प्रदर्शनों के दौरान दर्ज आपराधिक मामलों और उनकी वापसी को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि यदि राजनीतिक कारणों से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लिए जाते हैं, तो इससे भविष्य में कानून-व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है और गलत संदेश जाएगा।
याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई है कि छात्र आंदोलनों के दौरान हुई हिंसा से जुड़े मामलों को केवल राजनीतिक समझौते के आधार पर वापस न लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले को छात्र आंदोलनों से जुड़े अन्य लंबित मामलों के साथ टैग कर दिया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि किसी भी प्रदर्शन के दौरान यदि हिंसा होती है तो उसकी जिम्मेदारी केवल प्रदर्शनकारियों की नहीं, बल्कि आयोजकों की भी तय होनी चाहिए। उन्होंने आशंका जताई कि यदि सरकार दबाव में आकर मुकदमे वापस लेती है तो भविष्य में अन्य समूह भी हिंसक प्रदर्शनों के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं।
इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि छात्र युवा हैं और उन्हें कठोर कार्रवाई से अधिक सलाह, समझाइश और उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि राज्य की ओर से अत्यधिक आक्रामक रुख अपनाने से हालात और बिगड़ सकते हैं तथा हिंसा बढ़ने का खतरा रहता है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है और पुलिस को भी संयम के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। न्यायालय ने कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है, ताकि युवाओं का लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास बना रहे और वे हिंसा का रास्ता न अपनाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इस पूरे मामले में कानून का पालन, जवाबदेही और युवाओं के हित—तीनों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण होगा।