डॉ. अरुण मिश्रा लोकतन्त्र प्रहरी के दैनिक पाठक द्वारा भेजे गए पत्र से..
अब फ़ुर्सत कहाँ किसी को किसी से बात की,
बस यही एक जगह बची है मुलाक़ात की।
रिश्ते भी मतलब देखकर निभाए जाते हैं,
अपनों को छोड़, पद-कुर्सी वाले बुलाए जाते हैं।
बात होती है जहाँ केवल मतलब की बात की,
बस यही एक जगह बची है मुलाक़ात की।
इस जगह को भी नहीं छोड़ते हँसी-ठहाकों से,
किसी को ग़म नहीं है, कौन गुज़रा ज़माने से।
सबको तकल्लुफ़ है, ताल्लुक़ नहीं जज़्बात की,
बस यही एक जगह बची है मुलाक़ात की।
जब ज़रूरत थी उनको, कोई मिलने न गया,
मौत आई तो सारा शहर श्मशान गया।
वहाँ चर्चा सभी कर रहे थे उनके हालात की,
बस यही एक जगह बची है मुलाक़ात की।
अब फ़ुर्सत कहाँ किसी को किसी से बात की,
बस यही एक जगह बची है मुलाक़ात की।
— डॉ. अरुण मिश्रा “अकेला”