श्रीराम ने मर्यादित जीवन से समाज को दिया आदर्श आचरण का संदेश- विजय कौशिक

गाजीपुर। जनपद के नौली क्षेत्र स्थित श्री रुद्राम्बिका धाम परिसर में आयोजित श्री रुद्राम्बिका महायज्ञ सह श्रीराम कथा में प्रतिदिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। इसी क्रम में सोमवार को प्रातः आठ बजे से ही यज्ञ मंडप में दर्शन, पूजन और परिक्रमा के लिए भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया। यज्ञ मंडप में पुरोहितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ दी जा रही आहुतियों के स्वाहाकार से पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में गुंजायमान हो उठा।

महायज्ञ में अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति एवं आध्यात्मिक कल्याण की कामना के साथ सैकड़ों श्रद्धालुओं ने यज्ञ मंडप की परिक्रमा की। कई श्रद्धालुओं ने 108 परिक्रमा का संकल्प लेकर श्रद्धापूर्वक यज्ञ मंडप की परिक्रमा की।

इस अवसर पर यज्ञ के महात्म्य पर प्रकाश डालते हुए यज्ञाचार्य डॉ. धनंजय पांडेय ने कहा कि यज्ञाग्नि अपने भीतर समर्पित आहुतियों को वायुरूप में परिवर्तित कर समस्त जड़-चेतन प्राणियों तक बिना किसी भेदभाव के पहुंचाती है। वह न किसी को अपना मानती है और न पराया, न मित्र और न शत्रु। यज्ञाग्नि का यह स्वरूप हमें निःस्वार्थ सेवा और लोक कल्याण की अद्भुत प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि हमारा जीवन भी समस्त प्राणियों के लिए वरदान स्वरूप होना चाहिए। अपने संसाधनों, उपलब्धियों और ज्ञान का उपयोग हमें मुक्तहस्त से लोक कल्याण के लिए करना चाहिए। यज्ञ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रचंड आध्यात्मिक प्रेरणाओं से परिपूर्ण एक प्रयोग है। विधिपूर्वक संपन्न यज्ञ में देव आवाहन, मंत्र प्रयोग, संकल्प और सामूहिक सद्भावनाओं की शक्ति से ऐसी सकारात्मक ऊर्जा का सृजन होता है, जो मनुष्य की अंतःवृत्तियों को परिष्कृत कर उसे श्रेष्ठ जीवन की दिशा में प्रेरित करती है।

वहीं, श्रीराम कथा में कथावाचक पंडित विजय कौशिक जी महाराज ने भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र और मर्यादित जीवन का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का अवतरण समाज में मर्यादा की स्थापना, अमर्यादित आचरण से मानवता को उबारने और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए हुआ था। जिस समय धरती पर अधर्म और अनैतिक आचरण का प्रभाव बढ़ रहा था तथा ऋषि-मुनियों को असुरों के अत्याचारों का सामना करना पड़ता था, उस समय भगवान श्रीराम ने अपने दिव्य एवं मर्यादित जीवन से संपूर्ण मानव समाज को जीवन जीने की श्रेष्ठ सीख दी।

महाराज जी ने कहा कि राजपद के अधिकारी होते हुए भी भगवान श्रीराम ने त्याग, तपस्या और साधना को प्राथमिकता दी। उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग मानव समाज के लिए आदर्श और अनुकरणीय है। उनका व्यवहार, आचरण, वचन, रहन-सहन और युद्ध कौशल सभी मानवता को श्रेष्ठ जीवन की प्रेरणा देते हैं। यही कारण है कि भगवान श्रीराम आज भी करोड़ों लोगों के हृदय में विराजमान हैं।

भगवान श्रीराम के भ्रातृप्रेम का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि श्रीराम ने अपने भाइयों के प्रति सदैव प्रेम, त्याग और समर्पण का भाव रखा। वे अपने भाइयों को प्रसन्न रखने के लिए खेलों में स्वयं हारकर उन्हें जिताते थे और हर परिस्थिति में उनके हित को प्राथमिकता देते थे। उन्होंने अपने हिस्से का सुख और अधिकार भी भाइयों के साथ साझा किया। श्रीराम का यह चरित्र सिखाता है कि परिवार में प्रेम, त्याग और आपसी सम्मान ही रिश्तों की वास्तविक शक्ति है।

कथा के दौरान उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालु भावविभोर होकर कथा श्रवण करते रहे। कथा समापन के उपरांत श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण किया गया।

कार्यक्रम को सफल बनाने में बबुआ सिंह, गोविंद चौरसिया, अखिलेश पांडेय, विशेष त्रिपाठी, श्याम बिहारी यादव, संतोष सिंह, विद्यानंद सिंह, बृजेश पांडे, हृदय नारायण सिंह, सीताराम पुजारी, राम बिहारी सिंह  त्रिभुवन तिवारी, गोविंद पांडे, जितेंद्र कश्यप व शैलेंद्र पांडे सहित अनेक लोगों का सराहनीय योगदान रहा।

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