नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने ज्ञानेश कुमार को पद से निलंबित करने या उनकी शक्तियां सीमित करने का आदेश देने के बजाय चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने संकेत दिया कि आधिकारिक रिकॉर्ड में यदि एकतरफा तरीके से फैसले लिए जाने की पुष्टि होती है, तो ऐसे फैसलों को रद्द किया जा सकता है।
एकतरफा फैसलों की पुष्टि हुई तो रद्द कर देंगे: सुप्रीम कोर्ट
मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग जैसे तीन सदस्यीय संवैधानिक निकाय में निर्णय प्रक्रिया नियमों के अनुरूप होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि पहले आयोग का जवाब और संबंधित रिकॉर्ड सामने आने दिया जाए। यदि यह साबित होता है कि किसी निर्णय को तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति या आवश्यक बहुमत के बिना एकतरफा लिया गया था, तो सुप्रीम कोर्ट उन फैसलों को रद्द कर सकता है।
CEC की शक्तियां सीमित करने की मांग
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि अंतिम सुनवाई तक मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों को निलंबित किया जाए या उनके प्रशासनिक अधिकार वापस लिए जाएं। उनका तर्क था कि मामले की गंभीरता को देखते हुए अंतरिम स्तर पर ऐसा कदम जरूरी है।
वहीं, दूसरी याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 में बदलाव और SIR प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विवाद का सीधा असर चुनाव आयोग की निष्पक्षता और संस्थागत विश्वसनीयता पर पड़ता है।
‘निष्पक्ष चुनावों का माहौल आज वैसा नहीं दिख रहा’
मेनका गुरुस्वामी ने सुनवाई के दौरान कहा कि देश में लोग लंबे समय से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के माहौल में रहे हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें वैसी स्थिति नजर नहीं आ रही। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत मामले से जुड़े सभी पहलुओं को देख रही है और वह अपना होमवर्क करती है।
10 महीने में 14 बार आपत्ति दर्ज कराने का दावा
विवाद की शुरुआत एक खोजी मीडिया रिपोर्ट से हुई, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से संबंधित फैसलों और आदेशों पर करीब 14 बार आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया था कि कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत आदेश उनकी सहमति या जानकारी के बिना जारी किए गए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर तत्काल कार्रवाई करने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि तीन सदस्यीय आयोग से निर्णयों में सर्वसम्मति की अपेक्षा की जाती है और सहमति नहीं बनने की स्थिति में बहुमत का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। अब अदालत चुनाव आयोग के जवाब और आधिकारिक रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद आगे का फैसला करेगी।