क्या हैं शरीर की 5 प्राण ऊर्जाएं? जानिए इनके रंग, स्थान और काम

Health Desk। योग और आयुर्वेद की परंपरा में मानव शरीर को केवल हड्डियों, मांसपेशियों और अंगों का ढांचा नहीं माना गया है। भारतीय योग परंपरा में शरीर को एक सूक्ष्म ऊर्जा प्रणाली के रूप में भी समझाया गया है, जिसमें प्राण यानी जीवन ऊर्जा का प्रवाह माना जाता है। इसी प्राण ऊर्जा को पांच प्रमुख भागों में बांटा गया है, जिन्हें पंच प्राण या पंच वायु कहा जाता है। मान्यता के अनुसार, शरीर की अलग-अलग गतिविधियों में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

प्राण वायु को रक्तवर्ण और मणि के समान चमकीला बताया गया है। इसका संबंध मुख्य रूप से छाती और हृदय क्षेत्र से माना जाता है। इसकी गति भीतर की ओर बताई गई है। सांस लेना, ऊर्जा ग्रहण करना तथा इंद्रियों और मन को सक्रिय बनाए रखना इसके प्रमुख कार्य माने जाते हैं।

अपान वायु को इंद्रगोप कीट के समान प्रभायुक्त बताया गया है। इसकी गति नीचे की ओर मानी जाती है और इसका स्थान निचले पेट तथा श्रोणि क्षेत्र में बताया गया है। शरीर से मल-मूत्र और अन्य अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के साथ प्रजनन जैसी शारीरिक प्रक्रियाओं से भी इसका संबंध माना जाता है।

समान वायु को गौ-दूध के समान श्वेत बताया गया है। यह शरीर के मध्य भाग, विशेषकर नाभि और पेट के आसपास सक्रिय मानी जाती है। योग परंपरा में इसका संबंध पाचन और भोजन से प्राप्त पोषक तत्वों के अवशोषण से जोड़ा गया है। इसे शरीर में संतुलन बनाए रखने वाली ऊर्जा के रूप में भी समझाया जाता है।

उदान वायु को पाण्डुर यानी फीका श्वेताभ बताया गया है। इसकी गति ऊपर की ओर मानी जाती है। इसका संबंध कंठ और सिर के क्षेत्र से बताया गया है। बोलने, अपनी बात व्यक्त करने, उत्साह और विकास जैसी गतिविधियों से इसे जोड़ा जाता है। इसलिए इसे ऊपर की ओर ले जाने वाली ऊर्जा के रूप में समझा जाता है।

व्यान वायु को अग्नि की ज्वाला के समान बताया गया है। इसे पूरे शरीर में फैली हुई ऊर्जा माना जाता है। यह किसी एक अंग तक सीमित नहीं रहती। योग परंपरा में इसे शरीर के विभिन्न हिस्सों के बीच संचार और समन्वय से जोड़ा गया है।

इस प्रकार भारतीय योग परंपरा में पंच प्राण—प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान को शरीर की विभिन्न क्रियाओं से संबंधित माना गया है। हालांकि, इनके रंग और कार्यों से जुड़ी ये अवधारणाएं पारंपरिक योग एवं आयुर्वेदिक मान्यताओं पर आधारित हैं, इन्हें आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के शारीरिक तंत्रों का प्रत्यक्ष वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं माना जाता।

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