कितना निर्दयी है तू… कभी-कभी तू भी कितना निर्दयी हो जाता है, एक माँ के आँचल से उसका बेटा छीन ले जाता है.. : डॉ. अरुण मिश्रा

डॉ. अरुण मिश्रा लोकतन्त्र प्रहरी के दैनिक पाठक द्वारा भेजे गए पत्र से..

🌹 श्रद्धांजलि 🌹

कितना निर्दयी है तू…

कभी-कभी तू भी कितना निर्दयी हो जाता है,
एक माँ के आँचल से उसका बेटा छीन ले जाता है।

उस पल को सोचकर हर रूह काँप जाती है,
सब पूजते हैं तुझको… तू भगवान है या पापी है?

कितने खुश रहे होंगे , जब घर से निकले होंगे,
“यात्रा मंगलमय हो” — तेरा नाम लिए होंगे।

फिर भी न रहम खाया उस ममतामयी माँ पर,
जिगर का टुकड़ा जो लिपटा रहा उसके ही तन पर।

“मुझे मौत दे दे…” वो छटपटाकर चिल्लाई होगी,
“मेरे बेटे को बख्श दे…” तुझसे गुहार लगाई होगी।

पर तू तो ठहरा ज़ालिम, बनता है जग का स्वामी,
क्या कसूर था उस मासूम का, जो डूबा पानी में?

किसी दुश्मन के जीवन में,कभी ये दिन ना आए,
बेटा मौत की आगोश मे हो, और माँ रहे सीने से लिपटाए।

🙏 श्रद्धांजलि संग 🙏
✍️ डॉ. अरुण मिश्रा “अकेला”

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