BRICS के बाद बदले चीन-पाकिस्तान के तेवर, क्या दोस्ती में आ गई दरार?

नई दिल्ली। चीन और पाकिस्तान की दोस्ती को हमेशा से ‘हर मौसम में साथ’ रहने वाला रिश्ता माना जाता है। चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा सहयोगी है, जबकि पाकिस्तान ने चीन को सीपीईसी जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के जरिए अरब सागर तक पहुंच दी है। हालांकि, नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स बैठक के बाद दोनों देशों के रिश्तों को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं। आतंकवाद के खिलाफ जारी घोषणापत्र पर चीन के हस्ताक्षर और पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां इस बदलाव की ओर संकेत कर रही हैं।

ब्रिक्स घोषणापत्र में पहलगाम हमले की निंदा

ब्रिक्स बैठक में 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई। इस हमले में 26 लोगों की जान गई थी। घोषणापत्र में सीमा पार आतंकवाद, आतंकवाद को वित्तीय मदद और आतंकियों के ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया गया। हालांकि, दस्तावेज में पाकिस्तान का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया गया और भारत के ऑपरेशन सिंदूर का भी समर्थन नहीं किया गया।

इसके बावजूद चीन का इस घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करना भारत के लिए अहम माना जा रहा है। चीन पाकिस्तान का करीबी सहयोगी है और ऐसे समय में भारत की प्रमुख सुरक्षा चिंता से जुड़े बयान पर सहमति जताना दोनों देशों के बदलते समीकरणों पर चर्चा का कारण बन गया है।

चीन की मौजूदगी क्यों अहम?

पहलगाम हमले की निंदा कोई नई बात नहीं है। मई 2026 में ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों की बैठक में भी इस हमले की निंदा की गई थी। लेकिन दिल्ली में आयोजित बैठक का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि चीन और भारत 2020 के गलवान विवाद के बाद अपने रिश्तों में सुधार की कोशिश कर रहे हैं।

शी जिनपिंग की नई दिल्ली यात्रा और आतंकवाद के खिलाफ साझा बयान पर चीन की सहमति यह संकेत देती है कि बीजिंग भारत के साथ संबंधों को भी महत्व दे रहा है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि चीन ने पाकिस्तान का साथ छोड़ दिया है। सवाल यह है कि जब चीन के अपने आर्थिक और रणनीतिक हित दांव पर हों, तो वह पाकिस्तान का कितना समर्थन करेगा।

चीनी नागरिकों की सुरक्षा बनी बड़ी चुनौती

चीन-पाकिस्तान रिश्तों में तनाव का एक बड़ा कारण चीनी नागरिकों की सुरक्षा को माना जा रहा है। सीपीईसी परियोजनाओं पर काम कर रहे चीनी कर्मचारियों और इंजीनियरों पर खासकर बलूचिस्तान में बार-बार हमले हुए हैं। इन घटनाओं से चीन की चिंता बढ़ी है और वह पाकिस्तान से सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग कर रहा है।

सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के चलते कुछ परियोजनाओं पर काम प्रभावित होने की खबरें भी सामने आई हैं। वर्ष 2026 में चीन सीपीईसी 2.0 को आगे बढ़ाना चाहता है, लेकिन इसके लिए वह अपने नागरिकों और निवेश की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है। पाकिस्तान ने चीनी लोगों और परियोजनाओं की सुरक्षा बेहतर बनाने का भरोसा दिलाया है।

यही वजह है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते पूरी तरह टूटने के बजाय शर्तों और अपेक्षाओं के साथ आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं।

निवेश को लेकर भी बढ़ी चिंता

चीन और पाकिस्तान के बीच आर्थिक सहयोग को लेकर भी चुनौतियां सामने आ रही हैं। खबरों के मुताबिक, चीन की एक बड़ी कंपनी ने पाकिस्तान की बिजली कंपनी को खरीदने की योजना वापस ले ली। इसके पीछे आर्थिक समस्याओं और सुरक्षा जोखिमों को संभावित कारण बताया गया है।

सीपीईसी बड़े चीनी निवेश पर आधारित है। अब चीन केवल राजनीतिक दोस्ती के आधार पर निवेश करने के बजाय परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता, सुरक्षा और रिटर्न पर अधिक ध्यान दे रहा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान आर्थिक संकट और कर्ज की चुनौतियों से जूझ रहा है, जिससे उसे चीन की आर्थिक मदद की जरूरत बनी हुई है।

सीपीईसी 2.0 पर जारी है सहयोग

मई 2026 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने चीन का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने शी जिनपिंग से मुलाकात की और दोनों देशों ने दोस्ती तथा सीपीईसी को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। चीन ने सीपीईसी 2.0 को आगे बढ़ाने का समर्थन किया, जबकि पाकिस्तान ने सुरक्षा व्यवस्था सुधारने का भरोसा दिलाया।

अगस्त में भी दोनों पक्षों के बीच सीपीईसी को लेकर बातचीत हुई। इससे स्पष्ट है कि चीन पाकिस्तान से दूरी नहीं बना रहा, बल्कि सहयोग के बदले सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को लेकर अधिक अपेक्षाएं रख रहा है।

ब्रिक्स में पाकिस्तान की एंट्री पर भारत की भूमिका

पाकिस्तान वर्ष 2023 से ब्रिक्स में शामिल होने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए उसने चीन और रूस से समर्थन मांगा है। हालांकि, ब्रिक्स में नए सदस्य को शामिल करने के लिए सभी सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। भारत का विरोध पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती माना जाता है।

ब्रिक्स की सदस्यता से पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अधिक पहचान और उभरती आर्थिक शक्तियों के साथ संबंध मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। चीन एक ओर पाकिस्तान के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर भारत के साथ भी संबंध सुधारने की कोशिश कर रहा है।

चीन के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों अहम

चीन के पाकिस्तान में बड़े रणनीतिक हित हैं। सीपीईसी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से से होकर गुजरता है और ग्वादर बंदरगाह के जरिए चीन को अरब सागर तक पहुंच मिलती है। पाकिस्तान भारत के सामने चीन के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार भी है।

लेकिन भारत के साथ चीन के आर्थिक और व्यापारिक हित भी बड़े हैं। बीजिंग सीमा पर शांति और नई दिल्ली के साथ बेहतर संबंध चाहता है। ऐसे में चीन हर मुद्दे पर पाकिस्तान का पक्ष लेकर भारत के साथ रिश्तों को खराब नहीं करना चाहता।

ब्रिक्स घोषणापत्र में पहलगाम हमले की निंदा को इसी व्यापक रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। चीन पाकिस्तान का सहयोगी बना रह सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह हर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन करेगा।

क्या चीन-पाकिस्तान रिश्ते खराब हो रहे हैं?

चीन और पाकिस्तान के संबंधों में अभी किसी बड़े बदलाव की पुष्टि नहीं हुई है। चीन अब भी पाकिस्तान को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता है और सीपीईसी 2.0 का समर्थन कर रहा है। वहीं, पाकिस्तान चीन की आर्थिक मदद और निवेश पर काफी निर्भर है।

हालांकि, सुरक्षा चुनौतियों, चीनी नागरिकों पर हमलों, परियोजनाओं में देरी और निवेश की आर्थिक व्यवहार्यता को लेकर चीन का रुख अधिक सख्त होता दिख रहा है। पहले जहां पाकिस्तान चीन को रास्ता और रणनीतिक सहयोग देता था, वहीं अब चीन बदले में अपने लोगों की सुरक्षा, निवेश की सुरक्षा और परियोजनाओं में स्पष्ट परिणाम चाहता है।

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