भोपाल। सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस दौरान देशभर से लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा निकालकर पवित्र नदियों, विशेष रूप से गंगा से जल लाते हैं और भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों व शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि सावन में श्रद्धा और नियमपूर्वक शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करने से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं तथा जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट विष से सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने विष का पान कर उसे अपने कंठ में धारण कर लिया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और शरीर का ताप अत्यधिक बढ़ गया। भगवान शिव की जलन शांत करने के लिए देवताओं और परम शिवभक्त रावण ने पवित्र गंगाजल से उनका अभिषेक किया। तभी से श्रावण मास में गंगाजल अर्पित करने और कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा शुरू हुई, जिसे आज भी करोड़ों श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ निभाते हैं।
क्या होती है कांवड़?
कांवड़ एक विशेष प्रकार का लकड़ी या बांस से बना संतुलित ढांचा होता है, जिसे श्रद्धालु अपने कंधों पर रखकर गंगाजल ले जाते हैं। कांवड़िए गंगा या अन्य पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल यात्रा करते हुए भगवान शिव के प्रसिद्ध मंदिरों, ज्योतिर्लिंगों या अपने गांव-शहर के शिवालयों तक पहुंचते हैं और उसी जल से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं।
सावन में कांवड़ यात्रा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में कांवड़ यात्रा करने और भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यही कारण है कि हर वर्ष सावन के महीने में लाखों शिवभक्त भगवा वस्त्र धारण कर, नंगे पैर और पूरी श्रद्धा के साथ कांवड़ यात्रा में शामिल होते हैं।
नोट: कांवड़ यात्रा से जुड़ी मान्यताएं धार्मिक आस्था और पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। श्रद्धालु अपनी परंपराओं और विश्वास के अनुसार इसका पालन करते हैं।